Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1348

1875 Mantra
Devata- तनूनपात् Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣡धु꣢मन्तं तनूनपाद्य꣣ज्ञं꣢ दे꣣वे꣡षु꣢ नः कवे । अ꣣द्या꣡ कृ꣢णुह्यू꣣त꣡ये꣢ ॥१३४८॥

म꣡धु꣢꣯मन्तम् । त꣣नूनपात् । तनू । नपात् । यज्ञ꣢म् । दे꣣वे꣡षु꣢ । नः꣣ । कवे । अ꣡द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । कृ꣣णुहि । ऊत꣡ये꣢ ॥१३४८॥

Mantra without Swara
मधुमन्तं तनूनपाद्यज्ञं देवेषु नः कवे । अद्या कृणुह्यूतये ॥

मधुमन्तम् । तनूनपात् । तनू । नपात् । यज्ञम् । देवेषु । नः । कवे । अद्य । अ । द्य । कृणुहि । ऊतये ॥१३४८॥

Samveda - Mantra Number : 1348
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(तनूनपात् कवे) हे अपनी देहरूप आत्मा४ को न गिराने वाले—अमर बनाने वाले क्रान्तदर्शी परमात्मन्! तू (नः) मुझ आत्मयाजी के (मधुमन्तं यज्ञम्) आत्मा वाले५ स्वात्मसमर्पण वाले यज्ञ को (अद्य) आज—इसी जीवन में (ऊतये) आत्मरक्षा के लिये—अमरता के लिये (देवेषु कृणुहि) अमर-मुक्त आत्माओं में कर—मुक्त आत्मा बनने में सफल कर॥२॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से परमात्मा में अतन गमन प्रवेश करने वाला उपासक)॥ देवता—तनूनपात् (आत्मा को पतित न करने वाला किन्तु अमर बनाने वाला)॥ छन्दः—गायत्री॥