Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1347

1875 Mantra
Devata- इध्मः समिद्धो वाग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सु꣡ष꣢मिद्धो न꣣ आ꣡ व꣢ह दे꣣वा꣡ꣳ अ꣢ग्ने ह꣣वि꣡ष्म꣢ते । हो꣡तः꣢ पावक꣣ य꣡क्षि꣢ च ॥१३४७॥

सु꣡ष꣢꣯मिद्धः । सु । स꣣मिद्धः । नः । आ꣢ । व꣣ह । देवा꣢न् । अ꣣ग्ने । हवि꣡ष्म꣢ते । होत꣣रि꣡ति꣢ । पा꣣वक । य꣡क्षि꣢꣯ । च꣣ ॥१३४७॥

Mantra without Swara
सुषमिद्धो न आ वह देवाꣳ अग्ने हविष्मते । होतः पावक यक्षि च ॥

सुषमिद्धः । सु । समिद्धः । नः । आ । वह । देवान् । अग्ने । हविष्मते । होतरिति । पावक । यक्षि । च ॥१३४७॥

Samveda - Mantra Number : 1347
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 11; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पावक) हे दीप्त पवित्रकर्ता परमात्मन्! तू (हविष्मते) मुझ स्वात्म हवि देने वाले१ समर्पित करने वाले उपासक के लिये (होता) होता—ऋत्विक् बन (च) और (यक्षि) अध्यात्मयज्ञ करा, तथा (अग्ने) हे अग्रणायक परमात्मन्! तू (सु समिद्धः) सम्यक् प्रकाश युक्त हुआ (नः ‘माम्’) मुझे२ (देवान्-आवह) अमर३ मुक्त आत्माओं के प्रति प्राप्त करा—ले जा मोक्ष में पहुँचा॥१॥
Special
ऋषिः—मेधातिथिः (मेधा से परमात्मा में अतन गमन प्रवेश करने वाला उपासक)॥ देवता—इध्मः समिद्धोऽग्निर्वा (दीप्त-दीप्तिमान् या सर्वप्रकाशक अग्रणेता परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥