Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 132

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
व꣣य꣡मि꣢न्द्र त्वा꣣य꣢वो꣣ऽभि꣡ प्र नो꣢꣯नुमो वृषन् । वि꣣द्धी꣢ त्वा३꣱स्य꣡ नो꣢ वसो ॥१३२॥

व꣣य꣢म् । इ꣣न्द्र । त्वाय꣡वः꣢ । अ꣣भि꣢ । प्र । नो꣣नुमः । वृषन् । विद्धि꣢ । तु । अ꣣स्य꣢ । नः꣣ । वसो ॥१३२॥

Mantra without Swara
वयमिन्द्र त्वायवोऽभि प्र नोनुमो वृषन् । विद्धी त्वा३स्य नो वसो ॥

वयम् । इन्द्र । त्वायवः । अभि । प्र । नोनुमः । वृषन् । विद्धि । तु । अस्य । नः । वसो ॥१३२॥

Samveda - Mantra Number : 132
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वृषन्-इन्द्र) हे सुखों की वर्षा करने वाले ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (वयम्-आयवः) हम प्रापणशील—प्राप्त करने वाले प्रार्थीजन “आयवः-मनुष्यनाम” [निघं॰ २.३] (त्वा-अभि) तेरी शरण में (प्र-नोनुमः) प्रकृष्टरूप से पुनः पुनः स्तुति करते हैं “णु स्तुतौ” (अदादि॰) “नौति-अर्चतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४] (वसो) हे बसने वाले—अन्तर्यामिन् देव! (नः-अस्य तु विद्धि) हमारे इस हृद्गत भाव को तो तू जान। पदपाठ में “त्वायवः” ऐसा एक पद पढ़ा है, यहाँ ‘त्वा आयवः’ ऐसा पदच्छेद करके अर्थ किया है।
Essence
परमात्मन्! तू हमारे अन्दर वसने वाले अन्तर्यामी हमारे प्रत्येक हृद्गत भाव को जानता है तो फिर तेरी शरण में पहुँचने वाले हम मनुष्य तेरी पुनः पुनः स्तुति करते हैं तू इसे पूरा कर॥८॥
Special
ऋषिः—वसिष्ठः (परमात्मा में अत्यन्त बसने वाला उपासक)॥