Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 129

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣡न्द्र꣢ सान꣣सि꣢ꣳ र꣣यि꣢ꣳ स꣣जि꣡त्वा꣢नꣳ सदा꣣स꣡ह꣢म् । व꣡र्षि꣢ष्ठमू꣣त꣡ये꣢ भर ॥१२९॥

आ꣢ । इ꣣न्द्र । सानसि꣢म् । र꣣यि꣢म् । स꣣जि꣡त्वा꣢नम् । स꣣ । जि꣡त्वा꣢꣯नम् । स꣣दास꣡ह꣢म् । स꣣दा । स꣡ह꣢꣯म् । व꣡र्षि꣢꣯ष्ठम् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । भ꣣र । ॥१२९॥

Mantra without Swara
एन्द्र सानसिꣳ रयिꣳ सजित्वानꣳ सदासहम् । वर्षिष्ठमूतये भर ॥

आ । इन्द्र । सानसिम् । रयिम् । सजित्वानम् । स । जित्वानम् । सदासहम् । सदा । सहम् । वर्षिष्ठम् । ऊतये । भर । ॥१२९॥

Samveda - Mantra Number : 129
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! तू (सानसिम्) सम्भजनीय (सजित्वानम्) समान जय कराने वाले शत्रु के समकक्ष में जिताने वाले—(सदासहम्) सदा शत्रु के बल को अभिभूत करने वाले (वर्षिष्ठम्) अत्यन्त बढ़े चढ़े—(रयिम्) धन-आत्मबलरूप धन को “वीर्यं वै रयिः” [श॰ १३.४.२.११] (ऊतये) स्वरक्षा करने के लिये (आभर) समन्तरूप से हमारे अन्दर भर दें।
Essence
परमात्मन्! तू निरन्तर सेवन करने योग्य है, शत्रु के समकक्ष में सदा विजय कराने वाले सदा शत्रु के दमन करने वाले परमात्मन् अध्यात्म धन को हमारे अन्दर भरपूर कर दें॥५॥
Special
ऋषिः—मधुच्छन्दाः (मधु तन्त्र या मीठी इच्छा वाला)॥