Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1246

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं꣡ य꣢विष्ठ दा꣣शु꣢षो꣣ नॄ꣡ꣳपा꣢हि शृणु꣣ही꣡ गिरः꣢꣯ । र꣡क्षा꣢ तो꣣क꣢मु꣣त꣡ त्मना꣢꣯ ॥१२४६॥

त्वम् । य꣣विष्ठ । दाशु꣡षः꣢ । नॄन् । पा꣣हि । शृणुहि꣢ । गि꣡रः꣢꣯ । र꣡क्ष꣢꣯ । तो꣣क꣢म् । उ꣣त꣢ । त्म꣡ना꣢꣯ ॥१२४६॥

Mantra without Swara
त्वं यविष्ठ दाशुषो नॄꣳपाहि शृणुही गिरः । रक्षा तोकमुत त्मना ॥

त्वम् । यविष्ठ । दाशुषः । नॄन् । पाहि । शृणुहि । गिरः । रक्ष । तोकम् । उत । त्मना ॥१२४६॥

Samveda - Mantra Number : 1246
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यविष्ठ) हे अत्यन्त मिलने वाले४ आत्मभाव से अपनाने वाले परमात्मन्! तू (त्वं दाशुषः-नृन्-पाहि) स्वात्मदान करने वाले मुमुक्षुजनों की पालना कर (गिरः शृणुधि) स्तुति को सुन—स्वीकार कर (उत) अपि-और (त्मना तोकं रक्ष) अपने पुत्र रूप आत्मा की रक्षा कर सत्सङ्ग प्रदान करके॥३॥
Special