Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 124

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣दं꣡ व꣢सो सु꣣त꣢꣫मन्धः꣣ पि꣢बा꣣ सु꣡पू꣢र्णमु꣣द꣡र꣢म् । अ꣡ना꣢भयिन्ररि꣣मा꣡ ते꣢ ॥१२४॥

इ꣣द꣢म् । व꣣सो । सुत꣢म् । अ꣡न्धः꣢꣯ । पि꣡ब꣢꣯ । सु꣡पू꣢꣯र्णम् । सु । पू꣣र्णम् । उद꣡र꣢म् । उ꣣ । द꣡र꣢꣯म् । अ꣡ना꣢꣯भयिन् । अन् । आ꣣भयिन् । ररिम꣢ । ते꣣ ॥१२४॥

Mantra without Swara
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन्ररिमा ते ॥

इदम् । वसो । सुतम् । अन्धः । पिब । सुपूर्णम् । सु । पूर्णम् । उदरम् । उ । दरम् । अनाभयिन् । अन् । आभयिन् । ररिम । ते ॥१२४॥

Samveda - Mantra Number : 124
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वसो) हे मेरे हृदय में एवं मेरे में बसने वाले परमात्मन्! (इदं सुतम्) इस निष्पन्न (उत्-अरम्) ऊपर गमनशील उभरनेवाले—उछलनेवाले (अन्धः) सोम—
Essence
मेरे हृदय मेरे आत्मा में बसनेवाले निर्भयशरण परमात्मन्! तू मेरे अन्दर उभरते-उछलते हुए समस्त आत्मभावना से पूर्ण सोम्य हावभाव भरे स्तुति प्रार्थना उपासनारूप रसधारा प्रवाह को पानकर स्वीकार कर तेरी भेंट करता हूँ, तू मुझे अपना ले मैं तेरी निर्भयशरण में रहूँ, क्योंकि तेरा स्वभाव है “देहि मे ददामि ते” [यजुः॰ ३.५०] मुझे दे तुझे देता हूँ॥१०॥
Footnote
“अन्धसः सोमस्य” [निरु॰ १३.८] “अन्धसस्पते सोमस्य पते” [श॰ ४.१.१.२४] सोम्य हावभाव भरे स्तुति प्रार्थना उपासनारसधाराप्रवाह को (सुपूर्णम्) जो भलीभाँति पूर्ण है, समस्त आत्मभावना से भरा हुआ है उसे (पिब) पानकर स्वीकार कर (अनाभयिन्) ‘आभयम्-ईषद्भयं नेषद्भयं यस्मिन्-यस्याश्रये तथाभूतं’ थोड़ा भी भय जिसके आश्रय में नहीं वह ऐसे सर्वथा निर्भयशरणवाले परमात्मन्! (ते ररिमा) तेरे लिये हम देते हैं—समर्पित करते हैं। जैसे अन्यत्र भी कहा है—न घा॑ त्व॒द्रिगप॑ वेति मे॒ मन॒स्त्वे इत्कामं॑ पुरुहूत शिश्रय। राजे॑व दस्म॒ नि ष॒दोऽधि॑ ब॒र्हिष्य॒स्मिन्त्सु सोमे॑ऽव॒पान॑मस्तु ते॥२॥—[ऋ० १०.४३.२]
Special
ऋषिः—प्रियमेधः काण्वः (मेधावी का शिष्य मेधाप्रिय जिसको है ऐसा जन)॥