Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 122

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्रा꣣हं꣢꣫ यथा꣣ त्व꣡मीशी꣢꣯य꣣ व꣢स्व꣣ ए꣢क꣣ इ꣢त् । स्तो꣣ता꣢ मे꣣ गो꣡स꣢खा स्यात् ॥१२२॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । अह꣢म् । य꣡था꣢꣯ । त्वम् । ई꣡शी꣢꣯य । व꣡स्वः꣢꣯ । ए꣡कः꣢ । इत् । स्तो꣣ता꣢ । मे꣣ । गो꣡सखा꣢꣯ । गो । स꣣खा । स्यात् ॥१२२॥

Mantra without Swara
यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत् । स्तोता मे गोसखा स्यात् ॥

यत् । इन्द्र । अहम् । यथा । त्वम् । ईशीय । वस्वः । एकः । इत् । स्तोता । मे । गोसखा । गो । सखा । स्यात् ॥१२२॥

Samveda - Mantra Number : 122
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! (यत्-यथा त्वं वस्वः-एकः इत् ‘ईशिषे’) जबकि जैसे तू ऐश्वर्य का अकेला स्वामित्व करता है—स्वामी है (अहम्-ईशीय) तेरे साथ में रहता हुआ ऐश्वर्य का स्वामी हो जाऊँ—हो जाता हूँ तो (मे गोसखा) मेरा सहपाठी ‘विद्या में समान रहनेवाला’ (स्तोता स्यात्) तेरी स्तुति करनेवाला हो जावे—हो जाता है।
Essence
परमात्मा की स्तुति करनेवाला जीवन्मुक्त उपासक परमात्मा के आनन्द आदि ऐश्वर्य से युक्त है उसे ऐसा देख—देखादेखी से सहपाठी साथी भी परमात्मा का स्तोता बन जाता है, यह आस्तिक भाव का प्रचार एक आदर्श उपासक से होता है॥८॥
Special
ऋषिः—गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ (इन्द्रियों के विषय में अच्छी उक्ति समर्पण करने वाला और प्राण के सम्बन्ध में अच्छी उक्ति प्राणायाम करने वाला जन)॥