Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1218

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त꣢꣫ त्या ह꣣रि꣢तो꣣ र꣢थे꣣ सू꣡रो꣢ अयुक्त꣣ या꣡त꣢वे । इ꣢न्दु꣣रि꣢न्द्र꣣ इ꣡ति꣢ ब्रु꣣व꣢न् ॥१२१८॥

उ꣣त꣢ । त्याः । ह꣣रि꣡तः꣢ । र꣡थे꣢꣯ । सू꣡रः꣢꣯ । अ꣣युक्त । या꣡त꣢꣯वे । इ꣡न्दुः꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । इ꣡ति꣢꣯ । ब्रु꣣व꣢न् ॥१२१८॥

Mantra without Swara
उत त्या हरितो रथे सूरो अयुक्त यातवे । इन्दुरिन्द्र इति ब्रुवन् ॥

उत । त्याः । हरितः । रथे । सूरः । अयुक्त । यातवे । इन्दुः । इन्द्रः । इति । ब्रुवन् ॥१२१८॥

Samveda - Mantra Number : 1218
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 9; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(उत) हाँ (सूरः) सरणशील—व्यापनशील परमात्मा (त्याः-हरितः) उन हरणशील—उपासकों का हरने आकर्षित करने वाले आनन्दप्रवाहों को (रथे-अयुक्त) रमणीय अध्यात्मयज्ञ में जोड़ता है (इन्दुः-इन्द्रः-इति ब्रुवन्) तू इन्द्र है—उपासक आत्मा है मैं इन्दु हूँ—उपास्य हूँ—उपास्य हूँ मैं आ गया हूँ इस प्रकार कहता हुआ॥३॥
Special