Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 121

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣣ज्ञ꣡ इन्द्र꣢꣯मवर्धय꣣द्य꣢꣫द्भूमिं꣣ व्य꣡व꣢र्तयत् । च꣣क्राण꣡ ओ꣢प꣣शं꣢ दि꣣वि꣢ ॥१२१॥

य꣣ज्ञः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣वर्धयत् । य꣢त् । भू꣡मि꣢म् । व्य꣡व꣢꣯र्तयत् । वि꣣ । अ꣡व꣢꣯र्तयत् । च꣣क्राणः꣢ । ओपश꣢म् । ओ꣣प । श꣢म् । दि꣣वि꣢ ॥१२१॥

Mantra without Swara
यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्यद्भूमिं व्यवर्तयत् । चक्राण ओपशं दिवि ॥

यज्ञः । इन्द्रम् । अवर्धयत् । यत् । भूमिम् । व्यवर्तयत् । वि । अवर्तयत् । चक्राणः । ओपशम् । ओप । शम् । दिवि ॥१२१॥

Samveda - Mantra Number : 121
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यज्ञः-इन्द्रम्-अवर्धयत्) अध्यात्म यज्ञ ने उपासक के अन्दर परमात्मा को बढ़ा दिया—स्पष्ट साक्षात् करा दिया—करा देता है (यत्-भूमिं व्यवर्तयत्) पुनः वह परमात्मा उपासक की भूमि—स्थिति को विवर्तित कर देता है—बदल देता है बद्धावस्था से जीवन्मुक्तावस्था कर देता है (ओपशं-दिवि-चक्राणः) उस परमात्मा के समीप में शयन करनेवाले उपासक आत्मा को दिव्यधाम-अमृतधाम में पहुँचाने के हेतु।
Essence
अध्यात्म यज्ञ से उपासक के अन्दर परमात्मा साक्षात् हो जाता है, पुनः वह साक्षात् हुआ परमात्मा उपासक आत्मा की भूमि को बदल देता है उसे बद्ध से जीवन्मुक्त कर देता है परमात्मा के समीप शयन करनेवाले आत्मा को अमृतधाम—मोक्ष में पहुँचाने के लिए॥७॥
Special
ऋषिः—गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ (इन्द्रियों के विषय में अच्छी उक्ति समर्पण करने वाला और प्राण के सम्बन्ध में अच्छी उक्ति प्राणायाम करने वाला जन)॥