Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 119

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ वाजयामसि म꣣हे꣢ वृ꣣त्रा꣢य꣣ ह꣡न्त꣢वे । स꣡ वृषा꣢꣯ वृष꣣भो꣡ भु꣢वत् ॥११९॥

त꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वा꣣जयामसि । महे꣢ । वृ꣣त्रा꣡य꣢ । ह꣡न्त꣢꣯वे । सः । वृ꣡षा꣢꣯ । वृ꣣षभः꣢ । भु꣣वत् ॥११९॥

Mantra without Swara
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे । स वृषा वृषभो भुवत् ॥

तम् । इन्द्रम् । वाजयामसि । महे । वृत्राय । हन्तवे । सः । वृषा । वृषभः । भुवत् ॥११९॥

Samveda - Mantra Number : 119
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(तम्-इन्द्रं वाजयामसि) हम उस ऐश्वर्यवान् परमात्मा को अर्चित करते हैं—स्तुति में लाते हैं “वाजयति-अर्चतिकर्मा” [निघं॰ ३.१४] (महे वृत्राय हन्तवे) महान् आवरक पाप भाव को नष्ट करने के लिये (सः-वृषा) वह परमात्मा सुखज्ञान का वर्षक (वृषभः-भुवत्) सुख ज्ञान वर्षाने में समर्थ हो।
Essence
हमें सुखवर्षक परमात्मा की स्तुति करनी चाहिए जिससे वह अज्ञान—पाप का नाश करके सुख का वर्षानेवाला हो।
Special
ऋषिः—श्रुतकक्षः (अध्यात्मज्ञान का कक्ष—पार्श्व जिसने सुन लिया ऐसा उपासक आत्मा)॥