Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1149

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡मी꣢डिष्व꣣ यो꣢ अ꣣र्चि꣢षा꣣ व꣢ना꣣ वि꣡श्वा꣢ परि꣣ष्व꣡ज꣢त् । कृ꣣ष्णा꣢ कृ꣣णो꣡ति꣢ जि꣣ह्व꣡या꣢ ॥११४९॥

त꣢म् । ई꣣डिष्व । यः꣢ । अ꣣र्चि꣡षा꣢ । व꣡ना꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯ । प꣣रिष्व꣡ज꣢त् । प꣣रि । स्व꣡ज꣢꣯त् । कृ꣣ष्णा꣢ । कृ꣣णो꣡ति꣢ । जि꣣ह्व꣡या꣢ ॥११४९॥

Mantra without Swara
तमीडिष्व यो अर्चिषा वना विश्वा परिष्वजत् । कृष्णा कृणोति जिह्वया ॥

तम् । ईडिष्व । यः । अर्चिषा । वना । विश्वा । परिष्वजत् । परि । स्वजत् । कृष्णा । कृणोति । जिह्वया ॥११४९॥

Samveda - Mantra Number : 1149
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(तम्-ईडिष्व) हे उपासक जन! तू उस प्रकाशस्वरूप परमात्मा की स्तुति कर (यः) जो (अर्चिषा) अपनी प्रकाशशक्ति से*74 (विश्वा वना परिष्वजत्) सारे रश्मिमान्*75 ज्योतिष्मान् सूर्य आदि को [परितः] प्राप्त होता है—उन्हें ज्योति देता है—प्रकाशित करता है (जिह्वया कृष्णा कृणोति) पुनः अपने अन्दर ग्रहण शक्ति से*76 अन्धकार बना देता है*77 प्रलय में*78, एवं जगद्रचयिता प्रलयकर्ता परमात्मा है उपास्य है॥१॥
Footnote
[*74. “अर्चिः-ज्वलतो नाम” [निघं॰ १.१७]।] [*75. “वनं रश्मिनाम” [निघं॰ १.५] तद्वान्-मतुब्लोपश्छान्दसः।] [*76. “जिह्वा जोहुवा” [निरु॰ ५.२७] “अत्ता चराचरग्रहणात्” [वेदान्त॰]।] [*77. “तमो वै कृष्णम्” [मै॰ २.१.६]।] [*78. “तम आसीत् तमसा गूढमग्रे” [ऋ॰ १०.१२९.३]।]
Special
ऋषिः—भरद्वाजः (अमृत अन्नभोग को धारण करने वाला उपासक)॥ देवता—इन्द्राग्नी (ऐश्वर्यवान् एवं ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा)॥ छन्दः—गायत्री॥