Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1132

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानो अ꣣भि꣢꣫ स्पृधो꣣ वि꣢शो꣣ रा꣡जे꣢व सीदति । य꣡दी꣢मृ꣣ण्व꣡न्ति꣢ वे꣣ध꣡सः꣢ ॥११३२॥

प꣡व꣢꣯मानः । अ꣣भि꣢ । स्पृ꣡धः꣢꣯ । वि꣡शः꣢꣯ । रा꣡जा꣢꣯ । इ꣣व । सीदति । य꣢त् । ई꣣म् । ऋण्व꣡न्ति꣢ । वे꣣ध꣡सः꣢ ॥११३२॥

Mantra without Swara
पवमानो अभि स्पृधो विशो राजेव सीदति । यदीमृण्वन्ति वेधसः ॥

पवमानः । अभि । स्पृधः । विशः । राजा । इव । सीदति । यत् । ईम् । ऋण्वन्ति । वेधसः ॥११३२॥

Samveda - Mantra Number : 1132
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वेधसः-यत्-ईम्-ऋण्वन्ति) उपासक मेधावी आत्माएँ जब इस सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा को प्राप्त करते हैं*38 कर लेते हैं तो (पवमानः स्पृधः-अभि सीदति) आनन्दधारा में आता हुआ परमात्मा उनके साथ संघर्ष करनेवाले पाप काम आदि दोषों को दबा देता है (राजा-इव विशः) जैसे राजा प्रजा पर अधिकार करता है उनके उपद्रवों को दबा देता है॥५॥
Footnote
[*38. “ऋण्वन्ति गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४]।]
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