Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1131

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ य꣡त्काव्या꣢꣯ क꣣वि꣢र्नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अर्ष꣢꣯ति । स्व꣢꣯र्वा꣣जी꣡ सि꣢षासति ॥११३१॥

प꣡रि꣢꣯ । यत् । का꣡व्या꣢꣯ । क꣣विः꣢ । नृ꣣म्णा꣢ । पु꣣नानः꣢ । अ꣡र्ष꣢꣯ति । स्वः꣢ । वा꣣जी꣢ । सि꣣षासति ॥११३१॥

Mantra without Swara
परि यत्काव्या कविर्नृम्णा पुनानो अर्षति । स्वर्वाजी सिषासति ॥

परि । यत् । काव्या । कविः । नृम्णा । पुनानः । अर्षति । स्वः । वाजी । सिषासति ॥११३१॥

Samveda - Mantra Number : 1131
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(कविः) क्रान्तदर्शी सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा (यत्) कि जब (नृम्णा पुनानः) मन्त्ररूप ज्ञानधनों को झिराने हेतु (परि-अर्षति) सम्भजन स्थान ऋषियों के अन्तःकरण को परिप्राप्त होता है तब (स्वर्वाजी काव्या सिषासति) स्वः—मोक्ष भोगवाला—मोक्ष चाहनेवाला उपासक आत्मा उन काव्यधनों मन्त्रज्ञानों को सम्भजन करना चाहता है॥४॥
Special