Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1127

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ प्रि꣣यं꣢ दि꣣व꣢स्प꣣द꣡म꣢ध्व꣣र्यु꣢भि꣣र्गु꣡हा꣢ हि꣣त꣢म् । सू꣡रः꣢ पश्यति꣣ च꣡क्ष꣢सा ॥११२७॥

अभि꣢ । प्रि꣡य꣢म् । दि꣣वः꣢ । प꣣द꣢म् । अ꣣ध्वर्यु꣡भिः꣢ । गु꣡हा꣢꣯ । हि꣣त꣢म् । सू꣡रः꣢꣯ । प꣣श्यति । च꣡क्ष꣢꣯सा ॥११२७॥

Mantra without Swara
अभि प्रियं दिवस्पदमध्वर्युभिर्गुहा हितम् । सूरः पश्यति चक्षसा ॥

अभि । प्रियम् । दिवः । पदम् । अध्वर्युभिः । गुहा । हितम् । सूरः । पश्यति । चक्षसा ॥११२७॥

Samveda - Mantra Number : 1127
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(दिवः पदं प्रियम्) द्यौ—मोक्ष जिससे प्राप्त किया जावे उस के प्राप्तिनिमित्त सोम—शान्तस्वरूप प्रिय परमात्मा को (अध्वर्युभिः) मनोभावनाओं से*34 (गुहा हितम्) गुहा निहित कर दिये जैसे (सूरः-चक्षसा-अभि पश्यति) सेवन करनेवाला उपासक अपनी ज्ञानदृष्टि से सम्मुख देखता है—साक्षात् करता है॥१२॥
Footnote
[*34. “मनो वा अध्वर्युः” [श॰ १२.३.१.५]।]
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