Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1113

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्र꣡ व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥१११३॥

प्र꣢ । वः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । वृ꣣त्रह꣡न्त꣢माय । वृ꣣त्र । ह꣡न्त꣢꣯माय । वि꣡प्रा꣢꣯य । वि । प्रा꣣य । गाथ꣢म् । गा꣣यत । य꣢म् । जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥१११३॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय वृत्रहन्तमाय विप्राय गाथं गायत यं जुजोषते ॥

प्र । वः । इन्द्राय । वृत्रहन्तमाय । वृत्र । हन्तमाय । विप्राय । वि । प्राय । गाथम् । गायत । यम् । जुजोषते ॥१११३॥

Samveda - Mantra Number : 1113
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वः) हे उपासक जनो! तुम*111 जिस परमात्मा की ज्योति सब ज्योतियों की ज्योति है उस परमात्मा की (प्र) प्रार्थना करो (अर्च) ‘अर्चत’ अर्चना—स्तुति करो (उप) उपासना करो॥४॥
Footnote
[*111. ‘वः’ विभक्तिव्यत्ययः।] यह सायणमत में एक मन्त्र है। परन्तु माधव ने अपने विवरण में पूर्वार्चिक में आये तीन मन्त्रों का प्रतीक रूप माना है जो मन्त्र निम्न हैं— (देखो अर्थव्याख्या मन्त्र संख्या ४४६)
Special
ऋषिः—सम्पातः (स्तुति प्रार्थना उपासना का मेल करने वाला)॥ देवता—उषाः (परमात्मा की ज्योति—झलक झाँकी)॥ छन्दः—द्विपदा त्रिष्टुप् प्रतीकपृष्ट्या॥