Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1108

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गौपायना लौपायना वा Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व꣡सु꣢र꣣ग्नि꣡र्वसु꣢꣯श्रवा꣣ अ꣡च्छा꣢ नक्षि द्यु꣣म꣡त्त꣢मो र꣣यिं꣡ दाः꣢ ॥११०८॥

व꣡सुः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । व꣡सु꣢꣯श्रवाः । व꣡सु꣢꣯ । श्र꣣वाः । अ꣡च्छ꣢꣯ । न꣣क्षि । द्युम꣡त्त꣢मः । र꣣यि꣢म् । दाः꣣ ॥११०८॥

Mantra without Swara
वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि द्युमत्तमो रयिं दाः ॥

वसुः । अग्निः । वसुश्रवाः । वसु । श्रवाः । अच्छ । नक्षि । द्युमत्तमः । रयिम् । दाः ॥११०८॥

Samveda - Mantra Number : 1108
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) अग्रणी परमात्मा (वसुः) उपासक को अपने में वास देने वाला (वसुश्रवाः) बसाने वाला धन*106 जिसके पास है (द्युमत्तमः) अत्यन्त प्रकाशवान्—सर्वप्रकाशक (अच्छ नक्षि) तू भली प्रकार व्याप्त है (रयिं दाः) मोक्षैश्वर्य को प्रदान कर॥२॥
Footnote
[*106. “श्रवः-धननाम” [निघं॰ २.१०]।]
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