Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 11

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- आयुङ्क्ष्वाहिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥११॥

न꣡मः꣢꣯ । ते꣣ । अग्ने । ओ꣡ज꣢꣯से । गृ꣣ण꣡न्ति꣢ । दे꣣व । कृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मैः꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्र꣢म् । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯म् । अ꣣र्दय ॥११॥

Mantra without Swara
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥

नमः । ते । अग्ने । ओजसे । गृणन्ति । देव । कृष्टयः । अमैः । अमित्रम् । अ । मित्रम् । अर्दय ॥११॥

Samveda - Mantra Number : 11
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने देव) हे ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्म देव! (कृष्टयः) तुझे अपनी ओर कर्षणशील—खींचने वाले या तेरे प्रति आकृष्ट हुए उपासकजन “कृष्टयः—मनुष्याः” [निघं॰ २.३] (ओजसे) ओज—आत्मबल ज्ञानबल प्राप्त करने के लिये (ते नमः-गृणन्ति) तेरे लिये नम्र स्तवन—स्तुति उच्चारण करते हैं*7 (अमित्रम्-अमैः अर्दय) अध्यात्म यज्ञ के घातक काम क्रोध आदि शत्रु को बलों से “अमो बलम्” [निरु॰ १०.२१] नष्ट कर “अर्द हिंसायाम्” [चुरादि॰]।
Essence
प्रिय परमात्मन्! तुझे अपनी ओर आकर्षित करने वाले या तेरे प्रति आकृष्ट हुए उपासकजन तेरी ओर आने के लिये ओज—आत्मबल ज्ञान बल को प्राप्त करने के हेतु तेरी नम्र-रसीली स्तुतियाँ किया करते हैं, अतः मैं तेरी ओर आने के लिए तेरी नम्र-मीठी स्तुतियाँ करता हूँ। तेरी ओर आने में काम क्रोध आदि शत्रु बाधक हैं, इन्हें अपने बलों से नष्ट कर, जब मैं तेरी ओर आना चाहता हूँ तो ये बाधक बनकर आगे खड़े हो जाते हैं। तू ओजःस्वरूप है, मुझे ओज दे “ओजोऽस्योजो मयि धेहि” (यजुः॰ १९.९)॥१॥
Footnote
[*6.‘आयुङ्क्ष्व’ इति—‘आह’-ब्रवीति-इति बाहुलकात् किः प्रत्यय औणदिकः।] [*7. ‘नमः’ शब्द का सम्बन्ध वैदिक पद्धति में वाणी के साथ है, यहाँ ‘नमः-गृणन्ति’ है तथा “नम उक्तिं विधेम” (यजु॰ ४०.१६) मस्तक झुकाना अर्थ नहीं “नमो महद्भ्य नमो अर्भकेभ्यः” (ऋ॰ १.२७.१३) यथायोग्य स्वागत वचन बड़ों के लिये छोटों के लिये भी बोलना ‘नमः’ है।]
Special
छन्दः—गायत्री। स्वरः—षड्जः॥ ऋषिः—आयुङ्क्ष्वाहिः (परमात्मा में अपने को समस्तरूप से युक्त कर ऐसा कहने वाला*6 उपासक)॥