Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1082

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अमहीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡मिन्द्रे꣢꣯णो꣣त꣢ वा꣣यु꣡ना꣢ सु꣣त꣡ ए꣢ति प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣢ । स꣡ꣳ सूर्य꣢꣯स्य र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०८२॥

स꣢म् । इ꣡न्द्रे꣢꣯ण । उ꣣त꣢ । वा꣣यु꣡ना꣢ । सु꣣तः꣢ । ए꣣ति । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ । सम् । सू꣡र्य꣢꣯स्य । र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥१०८२॥

Mantra without Swara
समिन्द्रेणोत वायुना सुत एति पवित्र आ । सꣳ सूर्यस्य रश्मिभिः ॥

सम् । इन्द्रेण । उत । वायुना । सुतः । एति । पवित्रे । आ । सम् । सूर्यस्य । रश्मिभिः ॥१०८२॥

Samveda - Mantra Number : 1082
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सुतः) उपासना द्वारा निष्पन्न—साक्षात् हुआ सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा (पवित्रे) प्राप्तिस्थान हृदय में (इन्द्रेण-उत वायुना सम्-आ-एति) आत्मा से समागम करता है पुनः आयु*61 के साथ भी (सूर्यस्य रश्मिभि सम् आ एति) हृदय के*62 प्राणों के*63 साथ समागम करता है आत्मा में परमात्मा का समागमलाभ हुआ तो आत्मा की अमर आयु मुक्ति की आयु और सांसारिक जीवन की प्राप्ति होती है॥२॥
Footnote
[*61. “आयुर्वा एष यद् वायुः” [ऐ॰आ॰ २.४.३]।] [*62. “असौ वा आदित्यो हृदयम्” [श॰ ९.१.२.९०]।] [*63. “प्राणा रश्मयः” [तै॰ ३.२.५.२]।]
Special