Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 106

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
श्रु꣣꣬ष्ट्य꣢꣯ग्ने꣣ नव꣢स्य मे स्तो꣡म꣢स्य वीर विश्पते । नि꣢ मा꣣यि꣢न꣣स्त꣡प꣢सा र꣣क्ष꣡सो꣢ दह ॥१०६॥

श्रु꣣ष्टी꣢ । अ꣣ग्ने । न꣡व꣢꣯स्य । मे꣣ । स्तो꣡म꣢꣯स्य । वी꣣र । विश्पते । नि꣢ । मा꣣यि꣡नः꣢ । त꣡प꣢꣯सा । र꣣क्ष꣡सः । द꣣ह ॥१०६॥

Mantra without Swara
श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे स्तोमस्य वीर विश्पते । नि मायिनस्तपसा रक्षसो दह ॥

श्रुष्टी । अग्ने । नवस्य । मे । स्तोमस्य । वीर । विश्पते । नि । मायिनः । तपसा । रक्षसः । दह ॥१०६॥

Samveda - Mantra Number : 106
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(वीर विश्पते-अग्ने) हे शक्तिमन् प्रजामात्र-प्राणिमात्र के स्वामिन्! (मे) मेरे (नवस्य स्तोमस्य श्रुष्टी) स्तुतिपूर्ण छन्दः-हार्दिक गान को सुनकर ‘द्वितीयास्थाने षष्ठीव्यत्ययेन’ “स्नात्व्यादयश्च” [अष्टा॰ ७.१.४५] (मायिनः-रक्षसः) छली विपरीत आचरण वाले, मन में और कुछ, आचरण में और कुछ, ऐसे जन से अपने को बचाना चाहिये उनको (तपसा निदह) अपने तेज से दण्ड सामर्थ्य से भस्म कर या मेरे अन्दर से छलयुक्त विचारों को भस्म कर।
Essence
सर्वरक्षक परमात्मा हृदय से स्तुतिपूर्ण गुणगान से छल पूर्ण दुष्ट विचारक और विचारों को नष्ट कर देता है अपने उपासक की उनसे रक्षा करता है॥१०॥
Special
ऋषिः—वैयश्वो विश्वमनाः (इन्द्रिय घोड़ों की प्रवृत्ति से विगत सबके कल्याण में मनवाला उदार उपासक)॥ देवताः—वैश्वदेवोऽग्निः (सर्वश्रेष्ठ गुणवान् अग्रणेता परमात्मा)॥