Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1044

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ त्वा꣣ म꣡दा꣢य꣣ घृ꣡ष्व꣢य उ लोककृ꣣त्नु꣡मी꣢महे । त꣢व꣣ प्र꣡श꣢स्तये म꣣हे꣢ ॥१०४४॥

तम् । त्वा꣣ । म꣡दा꣢꣯य । घृ꣡ष्व꣢꣯ये । उ꣣ । लोककृत्नु꣢म् । लो꣣क । कृत्नु꣢म् । ई꣣महे । त꣡व꣢꣯ । प्र꣡श꣢꣯स्तये । प्र । श꣣स्तये । म꣢हे ॥१०४४॥

Mantra without Swara
तं त्वा मदाय घृष्वय उ लोककृत्नुमीमहे । तव प्रशस्तये महे ॥

तम् । त्वा । मदाय । घृष्वये । उ । लोककृत्नुम् । लोक । कृत्नुम् । ईमहे । तव । प्रशस्तये । प्र । शस्तये । महे ॥१०४४॥

Samveda - Mantra Number : 1044
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(घृष्वये मदाय-उ) काम आदि दोषों को धर्षित करने वाले दबा देने वाले आनन्द पाने के लिए (तं त्वा लोककृत्नुम्-ईमहे) उस तुझ लोकों के कर्ता—रचयिता को प्रार्थित करते हैं*19 तथा (तव) तेरी (महे प्रशस्तये) महती प्रशंसा स्तुति के लिए। तुझ से बलशाली आनन्द पाना और तेरी स्तुति करना यह लक्ष्य हम उपासकों का है और होना चाहिये॥८॥
Footnote
[*19. “ईमहे याच्ञाकर्मा” [निघं॰ ३.१९]।]
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