Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1043

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
गि꣡र꣢स्त इन्द꣣ ओ꣡ज꣢सा मर्मृ꣣ज्य꣡न्ते꣢ अप꣣स्यु꣡वः꣢ । या꣢भि꣣र्म꣡दा꣢य꣣ शु꣡म्भ꣢से ॥१०४३॥

गि꣡रः꣢꣯ । ते꣣ । इन्दो । ओ꣡ज꣢꣯सा । म꣣र्मृज्य꣡न्ते꣢ । अ꣣पस्यु꣡वः꣢ । या꣡भिः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । शु꣡म्भ꣢꣯से ॥१०४३॥

Mantra without Swara
गिरस्त इन्द ओजसा मर्मृज्यन्ते अपस्युवः । याभिर्मदाय शुम्भसे ॥

गिरः । ते । इन्दो । ओजसा । मर्मृज्यन्ते । अपस्युवः । याभिः । मदाय । शुम्भसे ॥१०४३॥

Samveda - Mantra Number : 1043
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(इन्दो) हे आनन्दरसपूर्ण परमात्मन्! (अपस्युवः-गिरः) कर्म—वैदिक कर्म को चाहती हुई विधान के अनुसार चलती हुई वाणियाँ—स्तुतिवाणियाँ (ते) तेरे लिए (ओजसा) आत्मीय बल से हमारे द्वारा (मर्मृज्यन्ते) प्रेरित की जाती हैं*18 (याभिः) जिन से प्रेरित हुआ या जिनके द्वारा (मदाय शुम्भसे) हमारे हर्ष आनन्द देने के लिए तू शोभित हो रहा है—सत्कृत हो रहा है॥७॥
Footnote
[*18. “मार्ष्टि गतिकर्मा” [निघं॰ २.१४]।]
Special