Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 104

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
न꣡ तस्य꣢꣯ मा꣣य꣡या꣢ च꣣ न꣢ रि꣣पु꣡री꣢शीत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । यो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ द꣣दा꣡श꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये ॥१०४॥

न꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । मा꣣य꣡या꣢ । च꣣ । न꣢ । रि꣣पुः꣢ । ई꣣शीत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । यः । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । द꣣दा꣡श꣢ । ह꣣व्य꣡दा꣢तये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये ॥१०४॥

Mantra without Swara
न तस्य मायया च न रिपुरीशीत मर्त्यः । यो अग्नये ददाश हव्यदातये ॥

न । तस्य । मायया । च । न । रिपुः । ईशीत । मर्त्यः । यः । अग्नये । ददाश । हव्यदातये । हव्य । दातये ॥१०४॥

Samveda - Mantra Number : 104
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो जन (हव्यदातये) हव्य स्तुतिरूप भेंट का दान जिसके लिये है ऐसे (अग्नये) अग्रणायक परमात्मा के लिये (ददाश) जो देता है अन्य के लिये नहीं अर्थात् जो केवल परमात्मा की स्तुति में जीवन बिताता है अन्य की स्तुति में नहीं (रिपुः-मर्त्यः-च न) शत्रुजन भी (मायया) प्रज्ञाछल बुद्धि से (न तस्य ईशीत) उस पर स्वामित्व नहीं कर सकता है—दबा नहीं सकता है।
Essence
स्तुतियोग्य एकमात्र परमात्मा है जो उसको ही स्तुतियों द्वारा अपना समस्त जीवन अर्पित कर देता है। शत्रु उस पर कुछ प्रभाव नहीं डाल सकता कुछ हानि नहीं पहुचा सकता है क्योंकि वह अकेला न रहा उसके साथ उसका परमात्मा सदा रक्षक है॥८॥
Special
ऋषिः—विश्वमना वैयश्वः (इन्द्रिय घोड़ों-इन्द्रियवृत्तियों से विगत होने में कुशल सबमें समान मनोभाव रखने वाला विरक्त समदर्शी जन)॥ देवताः—अग्निः (अन्तर्यामी सर्वसाक्षी परमात्मा)॥