Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1014

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ त्रि꣣त꣡स्य꣢ पा꣣ष्यो꣢३꣱र꣡भ꣢क्त꣣ य꣡द्गुहा꣢꣯ प꣣द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ स꣣प्त꣡ धाम꣢꣯भि꣣र꣡ध꣢ प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥

उ꣡प꣢꣯ । त्रि꣣त꣡स्य꣢ । पा꣣ष्योः꣢ । अ꣡भ꣢꣯क्त । यत् । गु꣡हा꣢꣯ । प꣡द꣢म् । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । स꣣प्त꣢ । धा꣡म꣢꣯भिः । अ꣡ध꣢꣯ । प्रि꣣य꣢म् ॥१०१४॥

Mantra without Swara
उप त्रितस्य पाष्यो३रभक्त यद्गुहा पदम् । यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम् ॥

उप । त्रितस्य । पाष्योः । अभक्त । यत् । गुहा । पदम् । यज्ञस्य । सप्त । धामभिः । अध । प्रियम् ॥१०१४॥

Samveda - Mantra Number : 1014
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
पदार्थ—(यत् पदं गुहा) जो सोम—शान्तस्वरूप परमात्मा प्रापणीय पद हृदय गुहा में है (त्रितस्य पाष्योः) स्तुति प्रार्थना उपासना तीनों का विस्तार करने वाले योग के गतिक्रमों*92 अभ्यास और वैराग्य में (उप-अभक्त) सेवन करता है (यज्ञस्य सप्तधामभिः) ज्ञान यज्ञ के सात धामों सात छन्दों के द्वारा*93 (अध प्रियम्) अनन्तर प्रिय परमात्मा को प्राप्त होता है॥२॥
Footnote
[*92. “पष गतौ” [चुरादि॰]।] [*93. “छन्दांसि वा अस्य सप्त धाम प्रियाणि” [शत॰ ९.२.३.४४]।]
Special