Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 1010

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣢दी꣣म꣢श्वं꣣ न꣡ हेता꣢꣯र꣣म꣡शू꣢शुभन्न꣣मृ꣡ता꣢य । म꣢धो꣣ र꣡स꣢ꣳ सध꣣मा꣡दे꣢ ॥१०१०॥

आत् । ई꣣म् । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । हे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡शू꣢꣯शुभन् । अ꣣मृ꣡ता꣢य । अ꣣ । मृ꣡ता꣢꣯य । म꣡धोः꣢꣯ । र꣡स꣢꣯म् । स꣣धमा꣡दे꣢ । स꣣ध । मा꣡दे꣢꣯ ॥१०१०॥

Mantra without Swara
आदीमश्वं न हेतारमशूशुभन्नमृताय । मधो रसꣳ सधमादे ॥

आत् । ईम् । अश्वम् । न । हेतारम् । अशूशुभन् । अमृताय । अ । मृताय । मधोः । रसम् । सधमादे । सध । मादे ॥१०१०॥

Samveda - Mantra Number : 1010
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(आत्) अनन्तर—पुनः (सधमादे) साथ होकर—परमात्मा के साथ होकर जहाँ माद—हर्ष आनन्द अनुभव किया जाता है उस हृदयप्रदेश में (मधोः) मधुमय—सोम—शान्त परमात्मा के (रसम्-अश्वं हेतारं न) व्यापनशील तथा प्रेरणा देने वाले आनन्दरस को सम्प्रति88 (अमृताय) अमृत—मोक्ष पाने के लिए (अशूशुभन्) प्राप्त कर प्रशंसित करते हैं स्तुत करते हैं*89॥३॥
Footnote
[*88. “न सम्प्रत्यर्थे” [निरु॰ ६.८]।] [*89. “शुम्भ भाषणे” [भ्वादि॰]।]
Special