Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 101

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
ज꣣ज्ञानः꣢ स꣣प्त꣢ मा꣣तृ꣡भि꣢र्मे꣣धा꣡माशा꣢꣯सत श्रि꣣ये꣢ । अ꣣यं꣢ ध्रु꣣वो꣡ र꣢यी꣣णां꣡ चि꣢केत꣣दा꣢ ॥१०१॥

ज꣣ज्ञानः꣢ । स꣣प्त꣢ । मा꣣तृ꣡भिः꣢ । मे꣣धा꣢म् । आ । अ꣣शासत । श्रिये꣢ । अ꣣य꣢म् । ध्रु꣣वः꣢ । र꣣यीणा꣢म् । चि꣣केतत् । आ꣢ ॥१०१॥

Mantra without Swara
जज्ञानः सप्त मातृभिर्मेधामाशासत श्रिये । अयं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा ॥

जज्ञानः । सप्त । मातृभिः । मेधाम् । आ । अशासत । श्रिये । अयम् । ध्रुवः । रयीणाम् । चिकेतत् । आ ॥१०१॥

Samveda - Mantra Number : 101
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सप्त) “सप्तभिः” सात—(मातृभिः) ज्ञान का मान—कलेवर दर्शाने वाली गायत्री आदि छन्दोमयी ज्योतियों द्वारा “मातरो भासां निर्मात्र्यः” [निरु॰ १२.८] (जज्ञानः) परमात्मा को जानता हुआ उपासक (श्रिये मेधाम्-आशासत) श्री—भद्रा कल्याणमयी स्थिति “श्रीर्वै भद्रा” [जै॰ ३.१७२] मेधा—उत्तम बुद्धि को चाहता है (अयं ध्रुवः) यह अविनाशी एकरस परमात्मा (रयीणाम्-आ-चिकेतत्) समस्त कल्याणकारी धनसम्पदाओं को भली-भाँति सुझा दें।
Essence
परमात्मा का ज्ञान उसकी सात छन्दों वाली वेदरूप ज्ञान ज्योतियाँ भली-भाँति कराती हैं, उपासक अपनी कल्याणकामना के लिये मेधा को प्राप्त कर निश्चय कर लेता है कि वह एक रस अविनाशी परमात्मा ही समस्त धनसम्पदाओं को सुझाता है उसका आश्रय लेना, वेदस्तवनों द्वारा उसकी उपासना करनी चाहिए॥५॥
Special
ऋषिः—त्रित आप्त्यः (मेधा से तीर्णतम सब प्राप्ति में अधिकारी)॥ देवताः—पवमानः सोमः-अग्निगर्भितः (अग्निरूप प्रकाशमान धाराओं में आता हुआ शान्त परमात्मा)॥