Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 992

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
या꣢ वा꣣ꣳ स꣡न्ति꣢ पुरु꣣स्पृ꣡हो꣢ नि꣣यु꣡तो꣢ दा꣣शु꣡षे꣣ नरा । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ ता꣢भि꣣रा꣡ ग꣢तम् ॥९९२॥

याः । वा꣣म् । स꣡न्ति꣢꣯ । पु꣣रुस्पृ꣡हः꣢ । पु꣣रु । स्पृ꣡हः꣢꣯ । नि꣣यु꣡तः꣢ । नि꣣ । यु꣡तः꣢꣯ । दा꣣शु꣡षे꣢ । न꣣रा । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । ता꣡भिः꣢꣯ । आ । ग꣣तम् ॥९९२॥

Mantra without Swara
या वाꣳ सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा । इन्द्राग्नी ताभिरा गतम् ॥

याः । वाम् । सन्ति । पुरुस्पृहः । पुरु । स्पृहः । नियुतः । नि । युतः । दाशुषे । नरा । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । ताभिः । आ । गतम् ॥९९२॥

Samveda - Mantra Number : 992
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (नरा) नेता (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन वा राजा एवं सेनापति ! (दाशुषे) त्यागशील, परोपकारी जन के लिए (याः) जो (वाम्) तुम्हारी (नियुतः) लाख संख्यावाली (पुरुस्पृहः) बहुत महत्वाकांक्षावाली उदात्त कामनाएँ हैं, (ताभिः) उनके साथ तुम (आ गतम्) आओ ॥२॥
Essence
शरीर में मनुष्य का अन्तरात्मा और मन तथा राष्ट्र में राजा और सेनाध्यक्ष दूसरों का हित करनेवाले मनुष्य का ही उपकार करते हैं, स्वार्थ की कीचड़ से लिप्त मनुष्य का नहीं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय को कहते हैं।