Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 971

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष बृ꣣ह꣡द्यशो꣢꣯ म꣣घ꣡व꣢द्भ्यो ध्रु꣣व꣢ꣳ र꣣यि꣢म् । इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥९७१॥

अभि꣢ । अ꣣र्ष । बृह꣢त् । य꣡शः꣢꣯ । म꣣घ꣢व꣢द्भ्यः । ध्रु꣣व꣢म् । र꣣यि꣢म् । इ꣡ष꣢꣯म् । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । आ । भ꣣र ॥९७१॥

Mantra without Swara
अभ्यर्ष बृहद्यशो मघवद्भ्यो ध्रुवꣳ रयिम् । इषꣳ स्तोतृभ्य आ भर ॥

अभि । अर्ष । बृहत् । यशः । मघवद्भ्यः । ध्रुवम् । रयिम् । इषम् । स्तोतृभ्यः । आ । भर ॥९७१॥

Samveda - Mantra Number : 971
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्ता परमैश्वर्यशाली परमेश्वर ! आप (मघवद्भ्यः) दानी धनियों को (ध्रुवम्) स्थिर (रयिम्) धन और (बृहत्) महान् (यशः) कीर्ति (अभ्यर्ष) प्राप्त कराओ और (स्तोतृभ्यः) उपासकों के लिए (इषम्) विज्ञान तथा इष्ट सुख (आ भर) लाओ ॥४॥
Essence
दानशील लोग ही धनप्राप्ति के अधिकारी होते हैं और जो परमात्मा की उपासना करते हैं, वे विवेकी तथा सुखी होते हैं ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा से प्रार्थना है।