Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 968

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢ क꣣वि꣢र्दे꣣व꣡वी꣢त꣣ये꣢ऽव्या꣣ वा꣡रे꣢भिरव्यत । सा꣣ह्वा꣡न्विश्वा꣢꣯ अ꣣भि꣡ स्पृधः꣢꣯ ॥९६८॥

प्र꣢ । क꣣विः꣢ । दे꣣व꣡वी꣢तये । दे꣣व꣢ । वी꣣तये । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯भिः । अ꣣व्यत । साह्वा꣢न् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣भि꣡ । स्पृ꣡धः꣢꣯ ॥९६८॥

Mantra without Swara
प्र कविर्देववीतयेऽव्या वारेभिरव्यत । साह्वान्विश्वा अभि स्पृधः ॥

प्र । कविः । देववीतये । देव । वीतये । अव्याः । वारेभिः । अव्यत । साह्वान् । विश्वाः । अभि । स्पृधः ॥९६८॥

Samveda - Mantra Number : 968
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(कविः) क्रान्तद्रष्टा और मेधावी यह सोम अर्थात् रस का भण्डार परमात्मा (देववीतये) दिव्यगुणों को उत्पन्न करने के लिए (अव्याः) शुद्ध चित्तवृत्ति के (वारेभिः) विघ्ननिवारक उपाय प्रणव-जप आदियों से (प्र अव्यत) प्राप्त होता है। (साह्वान्) विपत्तियों को दूर करनेवाला वह (विश्वाः स्पृधः) सब स्पर्धा करनेवाले आन्तरिक एवं बाह्य शत्रुओं को (अभि) पराजित कर देता है ॥१॥
Essence
परमात्मा की उपासना से सब दिव्यगुण स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं और विघ्नकारी शत्रु परास्त हो जाते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा की प्राप्ति का विषय है।