Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 965

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्व꣡ꣳ सो꣢म नृ꣣मा꣡द꣢नः꣣ प꣡व꣢स्व चर्षणी꣣धृ꣡तिः꣢ । स꣢स्नि꣣र्यो꣡ अ꣢नु꣣मा꣡द्यः꣢ ॥९६५॥

त्वम् । सो꣣म । नृमा꣡द꣢नः । नृ꣣ । मा꣡द꣢꣯नः । प꣡व꣢꣯स्व । च꣣र्षणीधृ꣡तिः꣢ । च꣣र्षणि । धृ꣡तिः꣢꣯ । स꣡स्निः꣢꣯ । यः । अ꣣नुमा꣡द्यः꣢ । अ꣣नु । मा꣡द्यः꣢꣯ ॥९६५॥

Mantra without Swara
त्वꣳ सोम नृमादनः पवस्व चर्षणीधृतिः । सस्निर्यो अनुमाद्यः ॥

त्वम् । सोम । नृमादनः । नृ । मादनः । पवस्व । चर्षणीधृतिः । चर्षणि । धृतिः । सस्निः । यः । अनुमाद्यः । अनु । माद्यः ॥९६५॥

Samveda - Mantra Number : 965
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) रस के भण्डार, शुभकर्मों में प्रेरक, चन्द्रमा के समान आह्लाददायक, सर्वान्तर्यामी,परमपिता जगदीश्वर ! (नृमादनः) मनुष्यों को आनन्दित करनेवाले, (चर्षणीधृतिः) मनुष्यों को धारण करनेवाले (त्वम्) आप (पवस्व) हमें पवित्र कीजिए, (यः) जो आप (सस्निः) सर्वथा शुद्ध और (अनुमाद्यः) अनुनय द्वारा प्रसन्न करने योग्य हो ॥५॥
Essence
जिस विशुद्ध परमात्मा में पाप की कणिका भी नहीं है, वह उपासकों को निर्मल करके पवित्र आनन्दरस से तृप्त करता है ॥५॥
Subject
आगे पुनः परमात्मा के विषय का वर्णन है।