Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 961

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ सोमा꣢꣯सो अधन्विषुः꣣ प꣡व꣢मानास꣣ इ꣡न्द꣢वः । श्री꣣णाना꣢ अ꣣प्सु꣡ वृ꣢ञ्जते ॥९६१॥

प्र꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । अ꣣धन्विषुः । प꣡व꣢꣯मानासः । इ꣡न्द꣢꣯वः । श्री꣣णानाः꣢ । अ꣣प्सु꣢ । वृ꣣ञ्जते ॥९६१॥

Mantra without Swara
प्र सोमासो अधन्विषुः पवमानास इन्दवः । श्रीणाना अप्सु वृञ्जते ॥

प्र । सोमासः । अधन्विषुः । पवमानासः । इन्दवः । श्रीणानाः । अप्सु । वृञ्जते ॥९६१॥

Samveda - Mantra Number : 961
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(पवमानासः) पवित्रता देनेवाले, (इन्दवः) दीप्त तथा रस से सराबोर करनेवाले (सोमासः) ब्रह्मानन्दरस (अधन्विषुः) जीवात्मा को प्राप्त हुए हैं। वे (श्रीणानाः)उस आत्मा को परिपक्व करते हुए (अप्सु) उसके द्वारा किये जाते हुए कर्मों में (वृञ्जते) अपने आपको छोड़ते हैं अर्थात् व्याप्त होते हैं ॥१॥
Essence
ब्रह्म के पास से प्राप्त आनन्दरसों से परिपक्व और पूर्णता को प्राप्त मनुष्य शुभकर्मों का ही आचरण करता है, अशुभों का नहीं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में ब्रह्मानन्दरूप सोमरसों का वर्णन है।