Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 952

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पावकोऽग्निर्बार्हस्पत्यो वा, गृहपतियविष्ठौ सहसः पुत्रावन्यतरो वा Chhand- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢ जु꣣ष꣢स्व꣣ प्र꣢ व꣣हा꣡ या꣢हि शूर꣣ ह꣡रि꣢ह । पि꣡बा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ म꣣ति꣡र्न मधो꣢꣯श्चका꣣न꣢꣫श्चारु꣣र्म꣡दा꣢य ॥९५२॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । जु꣣ष꣡स्व꣢ । प्र । व꣣ह । आ꣢ । या꣣हि । शूर । ह꣡रि꣢꣯ह । पि꣡ब꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । म꣣तिः꣢ । न । म꣡धोः꣢꣯ । च꣣कानः꣢ । चा꣡रुः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य ॥९५२॥

Mantra without Swara
इन्द्र जुषस्व प्र वहा याहि शूर हरिह । पिबा सुतस्य मतिर्न मधोश्चकानश्चारुर्मदाय ॥

इन्द्र । जुषस्व । प्र । वह । आ । याहि । शूर । हरिह । पिब । सुतस्य । मतिः । न । मधोः । चकानः । चारुः । मदाय ॥९५२॥

Samveda - Mantra Number : 952
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! तू (जुषस्व) प्रसन्न हो, (प्र वह) शरीरयात्रा को भली-भाँति वहन कर। हे (शूर) वीर, हे (हरिह) ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रियों से व्यवहार करनेवाले ! (तू आ याहि) आ। तू (सुतस्य) तैयार हुए वीररस का (पिब) पान कर। (मतिः न) मेधावी पुरुष के समान (चारुः) श्रेष्ठ तू (मदाय) उत्साह के लिए (मधोः) मधुर भक्ति-रस का (चकानः) प्रेमी बन ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्य का आत्मा वीररस का पान कर, उत्साहवान् होकर, भक्तिरस की तरङ्गों से तरङ्गित होकर कठिन से कठिन कार्यों को कर सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में जीवात्मा का विषय है।