Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 948

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ विश्वा꣢꣯ अ꣣भि꣢꣫ श्रियो꣣ऽग्नि꣢र्दे꣣वे꣡षु꣢ पत्यते । आ꣢꣫ वाजै꣣रु꣡प꣢ नो गमत् ॥९४८॥

अ꣣य꣢म् । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । श्रि꣡यः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । दे꣣वे꣡षु꣢ । प꣣त्यते । आ꣢ । वा꣡जैः꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । नः । गमत् ॥९४८॥

Mantra without Swara
अयं विश्वा अभि श्रियोऽग्निर्देवेषु पत्यते । आ वाजैरुप नो गमत् ॥

अयम् । विश्वाः । अभि । श्रियः । अग्निः । देवेषु । पत्यते । आ । वाजैः । उप । नः । गमत् ॥९४८॥

Samveda - Mantra Number : 948
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अयम्) यह (अग्निः) अग्रनायक परमेश्वर (देवेषु) उपासक सदाचारी विद्वानों में (विश्वाः श्रियः) सब आध्यात्मिक और बाह्य सम्पदाओं को (अभि पत्यते)प्राप्त कराता है। वह (वाजैः) दिव्य ऐश्वर्यों तथा बलों के साथ (नः) हमें (उप गमत्) प्राप्त होवे ॥३॥
Essence
परमेश्वर का उपासक सब प्रकार के भौतिक एवं आध्यात्मिक बल और ऐश्वर्य अपने पुरुषार्थ से पाने योग्य हो जाता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि उपासना किया गया परमेश्वर हमारे लिए क्या करता है।