Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 937

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢प्र꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ प꣡न्य꣢से꣣ ज꣡ना꣢य꣣ जु꣡ष्टो꣢ अ꣣द्रु꣡हः꣢ । वी꣣꣬त्य꣢꣯र्ष꣣ प꣡नि꣢ष्टये ॥९३७॥

प्र꣡प्र꣢꣯ । प्र । प्र꣣ । क्ष꣡या꣢꣯य । प꣡न्य꣢꣯से । ज꣡ना꣢꣯य । जु꣡ष्टः꣢꣯ । अ꣣द्रु꣡हः꣢ । अ꣣ । द्रु꣡हः꣢꣯ । वी꣣ति꣢ । अ꣣र्ष । प꣡नि꣢꣯ष्टये ॥९३७॥

Mantra without Swara
प्रप्र क्षयाय पन्यसे जनाय जुष्टो अद्रुहः । वीत्यर्ष पनिष्टये ॥

प्रप्र । प्र । प्र । क्षयाय । पन्यसे । जनाय । जुष्टः । अद्रुहः । अ । द्रुहः । वीति । अर्ष । पनिष्टये ॥९३७॥

Samveda - Mantra Number : 937
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम अर्थात् विद्यारस से स्नान किये हुए नवस्नातक ! (जुष्टः) लोगों का प्रिय, (अद्रुहः) द्रोह न करनेवाला तू (क्षयाय) प्रजाओं में सद्गुण आदि के निवास के लिए, (पन्यसे जनाय) अतिशय स्तोता जन उत्पन्न करने के लिए और (पनिष्टये) शुद्ध व्यवहार के लिए (वीती) तीव्रगति से (प्र प्र अर्ष) विचरण कर ॥३॥
Essence
नवस्नातकों का यह कर्त्तव्य है कि वे गुरुकुल से बाहर आकर वेदार्थ का उपदेश करते हुए लोगों को श्रेष्ठ गुण कर्मों से युक्त, परमेश्वर के स्तोता और शुद्ध व्यवहारवाला बनायें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में नवस्नातक को कहा जा रहा है।