Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 935

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡रि꣢ प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ क꣣वि꣡र्वया꣢꣯ꣳसि न꣣꣬प्त्यो꣢꣯र्हि꣣तः꣢ । स्वा꣣नै꣡र्या꣢ति क꣣वि꣡क्र꣢तुः ॥९३५॥

प꣡रि꣢꣯ । प्रि꣣या꣢ । दि꣣वः꣢ । क꣣विः꣢ । व꣡या꣢꣯ꣳसि । न꣣प्त्योः꣢ । हि꣣तः꣢ । स्वा꣣नैः꣢ । या꣣ति । कवि꣡क्र꣢तुः । क꣣वि꣢ । क्र꣣तुः ॥९३५॥

Mantra without Swara
परि प्रिया दिवः कविर्वयाꣳसि नप्त्योर्हितः । स्वानैर्याति कविक्रतुः ॥

परि । प्रिया । दिवः । कविः । वयाꣳसि । नप्त्योः । हितः । स्वानैः । याति । कविक्रतुः । कवि । क्रतुः ॥९३५॥

Samveda - Mantra Number : 935
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
शिष्यों के (नप्त्योः) आत्मा और मन का (हितः) हित करनेवाला, (कविक्रतुः) मेधावान् और सदाचारी आचार्य (दिवः) यश से प्रकाशित गुरुकुल के (प्रिया वयांसि) प्रिय शिष्यों को (स्वानैः) शास्त्रोपदेश के शब्दों के साथ (परियाति) प्राप्त होता है ॥१॥
Essence
जो स्वयं विद्वान् सदाचारी और पढ़ाने में चतुर है, वही आचार्य शिष्यों को सुयोग्य बना सकता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४७६ क्रमाङ्क पर परमात्मा के आनन्दरस के विषय में व्याख्यात हुई थी। यहाँ गुरु-शिष्य का विषय वर्णित है।