Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 914

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣च्छ꣡न्नश्व꣢꣯स्य꣣ य꣢꣫च्छिरः꣣ प꣡र्व꣢ते꣣ष्व꣡प꣢श्रितम् । त꣡द्वि꣢दच्छर्य꣣णा꣡व꣢ति ॥९१४॥

इ꣡च्छ꣢न् । अ꣡श्व꣢꣯स्य । यत् । शि꣡रः꣢꣯ । प꣡र्वते꣢꣯षु । अ꣡प꣢꣯श्रितम् । अ꣡प꣢꣯ । श्रि꣣तम् । त꣢त् । वि꣣दत् । शर्यणा꣡व꣢ति ॥९१४॥

Mantra without Swara
इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम् । तद्विदच्छर्यणावति ॥

इच्छन् । अश्वस्य । यत् । शिरः । पर्वतेषु । अपश्रितम् । अप । श्रितम् । तत् । विदत् । शर्यणावति ॥९१४॥

Samveda - Mantra Number : 914
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
इन्द्र जगदीश्वर (अश्वस्य) अन्तरिक्ष में व्याप्त बादल के (पर्वतेषु) पहाड़ों पर (अपश्रितम्) गिरे हुए (यत्) जिस (शिरः) जीर्ण-शीर्ण जल को (इच्छन्) फिर से भाप बनाना चाहता है (तत्) उस जल को वह (शर्यणावति)नदियों से युक्त समुद्र में (विदत्) पा लेता है। अभिप्राय यह है कि जो बादल का जल भूमि पर बरस कर नदियों द्वारा समुद्र में चला जाता है, उसे फिर वह सूर्य द्वारा भाप बनाकर अन्तरिक्ष में ले जाकर बादल के रूप में परिणत कर देता है ॥२॥
Essence
बादल से वर्षा और बरसे हुए जल से फिर बादल का निर्माण इस चक्र को जगदीश्वर ही चला रहा है। यदि ऐसी उसकी की हुई सुव्यवस्था न होती तो यह भूमण्डल शुष्क एवं वृक्ष-ओषधि-लता आदि से विहीन हो जाता ॥२॥ इस मन्त्र पर सायणाचार्य द्वारा प्रोक्त इतिहास एवं उसका प्रत्याख्यान पूर्वार्चिक मन्त्र क्रमाङ्क १७९ के भाष्य में देखना चाहिए ॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः जगदीश्वर का कर्म वर्णित है।