Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 913

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ दधी꣣चो꣢ अ꣣स्थ꣡भि꣢र्वृ꣣त्रा꣡ण्यप्र꣢꣯तिष्कुतः । ज꣣घा꣡न꣢ नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥९१३॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । द꣣धीचः꣢ । अ꣢स्थ꣡भिः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः । जघा꣡न꣢ । न꣣वतीः꣢ । न꣡व꣢꣯ ॥९१३॥

Mantra without Swara
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ॥

इन्द्रः । दधीचः । अस्थभिः । वृत्राणि । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः । जघान । नवतीः । नव ॥९१३॥

Samveda - Mantra Number : 913
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अप्रतिष्कुतः) कोई भी शत्रु जिसका मुकाबला नहीं कर सकता, ऐसा (इन्द्रः) शत्रुविदारक जगदीश्वर (दधीचः) लोकों के धारणकर्ता तथा अपनी धुरी पर घूमनेवाले सूर्य की (अस्थभिः) अस्थियों के तुल्य किरणों से (नव नवतीः) निन्यानवे प्रतिशत (वृत्राणि) रोग, मलिनता आदियों को (जघान) नष्ट कर देता है ॥१॥
Essence
अहो, कैसा है जगदीश्वर का महान् कर्म कि वह विशाल सूर्यरूप साधन से प्रायः सभी रोग, मल आदि को नष्ट करके हमारे जीवनों को सुरक्षित कर देता है। यदि वह मलों को हरनेवाले सूर्य को न रचता तो भूमण्डल अनेक व्याधियों से और सारे मलों से परिपूर्ण होकर निवासयोग्य भी न रहता ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १७९ क्रमाङ्क पर जीवात्मा और परमात्मा के विषय में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ जगदीश्वर का कर्म वर्णित किया जा रहा है।