Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 904

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हि꣣न्व꣢न्ति꣣ सू꣢र꣣मु꣡स्र꣢यः꣣ स्व꣡सारो जा꣣म꣢य꣣स्प꣡ति꣢म् । म꣣हा꣡मिन्दुं꣢꣯ मही꣣यु꣡वः꣢ ॥९०४॥

हि꣣न्व꣡न्ति꣢ । सू꣡र꣢꣯म् । उ꣡स्र꣢꣯यः । स्व꣡सा꣢꣯रः । जा꣣म꣡यः꣢ । प꣡ति꣢꣯म् । म꣣हा꣢म् । इ꣡न्दु꣢꣯म् । म꣣हीयु꣡वः꣢ ॥९०४॥

Mantra without Swara
हिन्वन्ति सूरमुस्रयः स्वसारो जामयस्पतिम् । महामिन्दुं महीयुवः ॥

हिन्वन्ति । सूरम् । उस्रयः । स्वसारः । जामयः । पतिम् । महाम् । इन्दुम् । महीयुवः ॥९०४॥

Samveda - Mantra Number : 904
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(सूरम्) सूर्य को (उस्रयः) किरणें (हिन्वन्ति) प्राप्त होती हैं, (स्वसारः) विवाहित (जामयः) बहिनें (पतिम्) अपने पति को (हिन्वन्ति) प्राप्त होती हैं। इसी प्रकार (महीयुवः) पूजा के इच्छुक उपासक (महाम्) महान्, (इन्दुम्) रस से सराबोर करनेवाले उपास्य परमात्मा को (हिन्वन्ति) प्राप्त होते हैं ॥१॥ यहाँ अप्रस्तुत किरणों (उस्रा) और बहिनों (जामयः) का तथा प्रस्तुत पूजेच्छुक उपासकों (महीयुवः) का ‘हिन्वन्ति’ रूप एक क्रिया से योग होने के कारण दीपक अलङ्कार है। साथ ही ‘स्वसारः’ और जामयः’ दोनों पदों के बहिन वाचक होने के कारण पुनरुक्ति प्रतीत होने से तथा व्याख्यात प्रकार से उसका परिहार हो जाने से पुनरुक्तवदाभास अलङ्कार भी है। ‘सूर, सारो’ तथा ‘महा, मही’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
Essence
जो लोग परमात्मा को पाने के लिए सर्वभाव से तत्पर होते हैं, वे अन्त में उसे पा ही लेते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा में परमात्मा का विषय कहते हैं।