Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 903

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣣मीचीना꣡ अ꣢नूषत꣣ ह꣡रि꣢ꣳ हिन्व꣣न्त्य꣡द्रि꣢भिः । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य पी꣣त꣡ये꣢ ॥९०३॥

समी꣣चीनाः꣢ । स꣣म् । ईचीनाः꣢ । अ꣣नूषत । ह꣡रि꣢꣯म् । हि꣣न्वन्ति । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पी꣣त꣡ये꣢ ॥९०३॥

Mantra without Swara
समीचीना अनूषत हरिꣳ हिन्वन्त्यद्रिभिः । इन्दुमिन्द्राय पीतये ॥

समीचीनाः । सम् । ईचीनाः । अनूषत । हरिम् । हिन्वन्ति । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । इन्दुम् । इन्द्राय । पीतये ॥९०३॥

Samveda - Mantra Number : 903
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
जो उपासक लोग (समीचीनाः) परस्पर मिलकर (अनूषत) पवित्रकर्ता परमात्मा की स्तुति करते हैं और (हरिम्) अज्ञान, दुःख आदि को हरनेवाले उसे (अद्रिभिः) अखण्डित ध्यानों से (हिन्वन्ति) अपने अन्दर बढ़ाते हैं, वे (इन्दुम्) सराबोर करनेवाले ब्रह्मानन्द-रस को (इन्द्राय) अपने जीवात्मा को (पातवे) पिलाने में समर्थ होते हैं ॥६॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि ध्यानयोग द्वारा परमात्मा की आराधना करके ब्रह्मानन्द को प्राप्त करें ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में कौन ब्रह्मानन्द को प्राप्त करते हैं, इसका कथन है।