Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 902

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- बृहन्मतिराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣣वि꣡वा꣢सन्परा꣣व꣢तो꣣ अ꣡थो꣢ अर्वा꣣व꣡तः꣢ सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢य सिच्यते꣣ म꣡धु꣢ ॥९०२॥

आ꣣वि꣡वा꣢सन् । आ꣢ । वि꣡वा꣢꣯सन् । प꣣राव꣡तः꣢ । अ꣡थ꣢꣯ । उ꣣ । अर्वाव꣡तः꣢ । सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सि꣣च्यते । म꣡धु꣢꣯ ॥९०२॥

Mantra without Swara
आविवासन्परावतो अथो अर्वावतः सुतः । इन्द्राय सिच्यते मधु ॥

आविवासन् । आ । विवासन् । परावतः । अथ । उ । अर्वावतः । सुतः । इन्द्राय । सिच्यते । मधु ॥९०२॥

Samveda - Mantra Number : 902
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
पवमान सोम अर्थात् चित्तशोधक परमेश्वर (सुतः) हृदय में प्रकट होकर (परावतः) पराविद्या के ज्ञानी (अथ उ) और (अर्वावतः) अपरा विद्या के ज्ञानी उपासकों को (आ विवासन्) सम्मानित करता है। उस परमेश्वर से झरा हुआ (मधु) मधुर आनन्दरस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (सिच्यते) सींचा जाता है ॥५॥
Essence
जो अपने आपको मधुर ब्रह्मानन्द-रस से स्नान कराते हैं, वे निर्मल अन्तःकरणवाले उपासक सर्वथा क्लेशों से छूटकर परमगति मोक्ष को प्राप्त करते हैं ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।