Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 893

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सु꣣वित꣡स्य꣢ वनाम꣣हे꣢ऽति꣣ से꣡तुं꣢ दुरा꣣꣬य्य꣢꣯म् । सा꣣ह्या꣢म꣣ द꣡स्यु꣢मव्र꣣तम् ॥८९३॥

सु꣣वित꣡स्य꣢ । व꣣नामहे । अ꣡ति꣢꣯ । से꣡तु꣢꣯म् । दु꣣राय्य꣢म् । दुः꣣ । आय्य꣢म् । सा꣣ह्या꣡म꣢ । द꣡स्यु꣢꣯म् । अ꣣व्रत꣢म् । अ꣣ । व्रत꣢म् ॥८९३॥

Mantra without Swara
सुवितस्य वनामहेऽति सेतुं दुराय्यम् । साह्याम दस्युमव्रतम् ॥

सुवितस्य । वनामहे । अति । सेतुम् । दुराय्यम् । दुः । आय्यम् । साह्याम । दस्युम् । अव्रतम् । अ । व्रतम् ॥८९३॥

Samveda - Mantra Number : 893
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हम (सेतुम्) रुकावट को (अति) अतिक्रान्त अर्थात् पार करके (सुवितस्य) सुप्राप्त आनन्द—रसागार परमात्मा के एवं विद्यारसागार आचार्य के (दुराय्यम्) दुष्प्राप्य आनन्दरस वा विद्यारस को (वनामहे) सेवन करते हैं। उससे हम (अव्रतम्) व्रतविरोधी वा सत्कर्मविरोधी (दस्युम्) उपक्षयकारी काम, क्रोध, आदि छहों रिपुओं को (साह्याम) पराजित कर देवें ॥२॥
Essence
गुरुओं के सत्कार से और परमात्मा की उपासना से विद्या और आनन्द को प्राप्त करके, बाह्य तथा आन्तरिक शत्रुओं को पराजित करके सत्कर्मों का आचरण करना चाहिए ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य का विषय वर्णित है।