Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 883

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- तिरश्चीराङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
श्रु꣣धी꣡ हवं꣢꣯ तिर꣣श्च्या꣢꣫ इन्द्र꣣ य꣡स्त्वा꣢ सप꣣र्य꣡ति꣣ । सु꣣वी꣡र्य꣢स्य꣣ गो꣡म꣢तो रा꣣य꣡स्पू꣢र्धि म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥८८३॥

श्रु꣣धी꣢ । ह꣡व꣢꣯म् । ति꣣रश्च्याः꣢ । ति꣣रः । च्याः꣢ । इ꣡न्द्र꣣ । यः । त्वा꣣ । सपर्य꣡ति꣢ । सु꣣वी꣡र्य꣢स्य । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । रा꣣यः꣢ । पू꣡र्धि । महा꣢न् । अ꣣सि ॥८८३॥

Mantra without Swara
श्रुधी हवं तिरश्च्या इन्द्र यस्त्वा सपर्यति । सुवीर्यस्य गोमतो रायस्पूर्धि महाꣳ असि ॥

श्रुधी । हवम् । तिरश्च्याः । तिरः । च्याः । इन्द्र । यः । त्वा । सपर्यति । सुवीर्यस्य । सु । वीर्यस्य । गोमतः । रायः । पूर्धि । महान् । असि ॥८८३॥

Samveda - Mantra Number : 883
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) दोष दूर करनेवाले परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (यः) जो मनुष्य (त्वा) आपको (सपर्यति) पूजता वा सत्कृत करता है, उस (तिरश्च्याः) पुरुषार्थी की (हवम्) पुकार को (श्रुधि) सुनो। (सुवीर्यस्य) उत्कृष्ट बल से युक्त (गोमतः) प्रशस्त गाय, वाणी आदि से युक्त (रायः) विद्या, धन-धान्य आदि ऐश्वर्य की (पूर्धि) पूर्ति करो। आप (महान्) महान् (असि) हो ॥१॥
Essence
जैसे जगदीश्वर अपने पूजक पुरुषार्थी जनों को सब ऐश्वर्यों से पूर्ण करता है, वैसे ही राजा प्रजाओं से पुरुषार्थ करवाकर उन्हें धन-धान्य आदि से पूर्ण करे और आचार्य पुरुषार्थी शिष्यों को अपरा विद्या, परा विद्या, आरोग्य, सदाचार आदियों से परिपूर्ण करे ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ३४६ क्रमाङ्क पर परमात्म-प्रार्थना के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ परमात्मा, आचार्य और राजा तीनों को सम्बोधन है।