Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 881

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ये꣢न꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्या꣣य꣢वे꣣ म꣡न꣢वे च वि꣣वे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानो꣢ अ꣣स्य꣢ ब꣣र्हि꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि ॥८८१॥

ये꣡न꣢꣯ । ज्यो꣡ती꣢꣯ꣳषि । आ꣡व꣡ये꣢ । म꣡न꣢꣯वे । च꣣ । विवे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानः꣢ । अ꣣स्य꣢ । ब꣡र्हि꣢षः꣢ । वि । रा꣡जसि ॥८८१॥

Mantra without Swara
येन ज्योतीꣳष्यायवे मनवे च विवेदिथ । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि ॥

येन । ज्योतीꣳषि । आवये । मनवे । च । विवेदिथ । मन्दानः । अस्य । बर्हिषः । वि । राजसि ॥८८१॥

Samveda - Mantra Number : 881
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे इन्द्र अर्थात् परमात्मन्, आचार्य वा राजन् ! (येन) जिस आनन्द, ज्ञान वा बल से, आप (आयवे) कर्मयोगी, पुरुषार्थी (मनवे च) और मननशील जन के लिए (ज्योतींषि) अन्तःप्रकाशों एवं बाह्य प्रकाशों को (विवेदिथ) प्राप्त कराते हो, उस आनन्द, ज्ञान वा बल से (मन्दानः) आनन्दित होते हुए आप (अस्य (बर्हिषः) इस हृदयासन पर, कुशासन पर वा राजसिंहासन पर (वि राजसि) विशेष रूप से शोभित होते हो ॥२॥
Essence
परमेश्वर आचार्य और राजा से आनन्द, ज्ञान वा बल प्राप्त करके सब लोग सुखी, विज्ञानवान्, बलवान्, पुरुषार्थी और मननशील होते हुए जीवन में सफल हों ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर, आचार्य और राजा को सम्बोधन है।