Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 872

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ययातिर्नाहुषः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सु꣣ता꣢सो꣣ म꣡धु꣢मत्तमाः꣣ सो꣢मा꣣ इ꣡न्द्रा꣢य म꣣न्दि꣡नः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢वन्तो अक्षरं दे꣣वा꣡न्ग꣢च्छन्तु वो꣣ म꣡दाः꣢ ॥८७२॥

सु꣣ता꣡सः꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तमाः । सो꣡माः꣢꣯ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣न्दि꣡नः꣢ । प꣣वि꣡त्र꣢वन्तः । अ꣣क्षरन् । देवा꣣न् । ग꣡च्छ꣢꣯न्तु । वः । म꣡दाः꣢꣯ ॥८७२॥

Mantra without Swara
सुतासो मधुमत्तमाः सोमा इन्द्राय मन्दिनः । पवित्रवन्तो अक्षरं देवान्गच्छन्तु वो मदाः ॥

सुतासः । मधुमत्तमाः । सोमाः । इन्द्राय । मन्दिनः । पवित्रवन्तः । अक्षरन् । देवान् । गच्छन्तु । वः । मदाः ॥८७२॥

Samveda - Mantra Number : 872
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(मधुमत्तमाः) अतिशय मधुर, (मन्दिनः) आनन्दजनक (सोमाः) ज्ञान-रस (इन्द्राय) शिष्य के जीवात्मा के लिए (सुतासः) आचार्य द्वारा अभिषुत किये गये हैं। (पवित्रवन्तः) पवित्र मन से सम्बद्ध वे (अक्षरन्) आत्मा में क्षरित हो रहे हैं। हे शिष्यो ! (वः मदाः) तुम्हें आनन्दित करनेवाले वे ज्ञान-रस (देवान्) दिव्य गुणोंवाले दूसरे लोगों को भी (गच्छन्तु) प्राप्त हों ॥१॥
Essence
सुयोग्य गुरुओं से मधुर पद्धति द्वारा पढ़ाये गये शिष्य ज्ञानी स्नातक होकर, बाहर जाकर अन्य जनों को भी विद्यादान करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ५४७ क्रमाङ्क पर परमानन्द-रस के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ ज्ञानरस का विषय वर्णित है।