Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 857

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त꣡र꣢त्समु꣣द्रं꣡ पव꣢꣯मान ऊ꣣र्मि꣢णा꣣ रा꣡जा꣢ दे꣣व꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् । अ꣡र्षा꣢ मि꣣त्र꣢स्य꣣ व꣡रु꣢णस्य꣣ ध꣡र्म꣢णा꣣ प्र꣡ हि꣢न्वा꣣न꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥८५७॥

त꣡रत्꣢꣯ । स꣣मु꣢द्रम् । स꣣म् । उद्र꣢म् । प꣡व꣢꣯मानः । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । रा꣡जा꣢꣯ । दे꣣वः꣢ । ऋ꣣त꣢म् । बृ꣣ह꣢त् । अ꣡र्ष꣢꣯ । मि꣣त्र꣡स्य꣢ । मि꣣ । त्र꣡स्य꣢꣯ । व꣡रु꣢꣯णस्य । ध꣡र्म꣢꣯णा । प्र । हि꣣न्वानः꣢ । ऋ꣣त꣢म् । बृ꣣ह꣢त् ॥८५७॥

Mantra without Swara
तरत्समुद्रं पवमान ऊर्मिणा राजा देव ऋतं बृहत् । अर्षा मित्रस्य वरुणस्य धर्मणा प्र हिन्वान ऋतं बृहत् ॥

तरत् । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । पवमानः । ऊर्मिणा । राजा । देवः । ऋतम् । बृहत् । अर्ष । मित्रस्य । मि । त्रस्य । वरुणस्य । धर्मणा । प्र । हिन्वानः । ऋतम् । बृहत् ॥८५७॥

Samveda - Mantra Number : 857
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
शिष्य (राजा) तेज से दीप्त तथा (देवः) विद्वान् होता हुआ (बृहत् ऋतम्) महान् सत्य ज्ञान, सत्य आचरण और सत्य ब्रह्मानन्द को (ऊर्मिणा) तरङ्गरूप में (पवमानः) अपने आत्मा में प्रवाहित करता हुआ (समुद्रम्) ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र को (तरत्) तैर जाता है, अर्थात् स्नातक बन जाता है। आगे प्रत्यक्षरूप से वर्णन है—हे विद्वान् स्नातक ! तू (मित्रस्य) मैत्री के निर्वाहक तथा (वरुणस्य) शिष्य रूप में तुझे वरनेवाले आचार्य के (धर्मणा) उपदिष्ट धर्म के अनुसार, जनसमाज में (बृहत्) महान् सत्यज्ञान, सत्य आचरण और सत्य ब्रह्मानन्द को (हिन्वानः) प्रेरित करता हुआ (अर्ष) गति कर, व्यवहार कर ॥२॥ अथर्ववेद में स्नातक का वर्णन इस रूप में किया गया है—ब्रह्मचारी देदीप्यमान ज्ञान को अपने अन्दर धारण करता है। उसके अन्दर सब दिव्य गुण समाविष्ट हो जाते हैं। हे ब्रह्मचारी, तू प्राण, अपान, व्यान, वाणी, मन, हृदय, ब्रह्म, मेधा इन सबकी शक्ति को अपने अन्दर उत्पन्न करता हुआ हमें भी चक्षु, श्रोत्र, यश, अन्न, रेतस्, रक्त एवं पाचनशक्ति प्रदान कर। इन सब शक्तियों को ब्रह्मचारी ज्ञानसलिल के पृष्ठ ब्रह्मचर्याश्रमरूप समुद्र में तप करता हुआ प्राप्त करता है। वह जब स्नातक बनता है तब अन्यों का धारक-पोषक और पीतवेषधारी होकर पृथिवी पर बहुत चमकता है। (अथ० ११।५।२४-२६)
Essence
स्नातकों को चाहिए कि गुरुओं से अध्ययन किये हुए सब लौकिक और आध्यात्मिक ज्ञान को समाज में फैलाएँ ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में स्नातक का वर्णन है।