Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 856

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ सोमा꣢꣯स आ꣣य꣢वः꣣ प꣡व꣢न्ते꣣ म꣢द्यं꣣ म꣡द꣢म् । स꣣मु꣡द्रस्याधि꣢꣯ वि꣣ष्ट꣡पे꣢ मनी꣣षि꣡णो꣢ मत्स꣣रा꣡सो꣢ मद꣣च्यु꣡तः꣢ ॥८५६॥

अ꣡भि꣢ । सो꣡मा꣢꣯सः । आ꣣य꣡वः꣢ । प꣡व꣢꣯न्ते । म꣡द्य꣢꣯म् । म꣡द꣢꣯म् । स꣣मु꣡द्र꣢स्य । स꣡म् । उ꣡द्र꣢स्य । अ꣡धि꣢꣯ । वि꣣ष्ट꣡पे꣢ । म꣣नीषि꣡णः꣢ । म꣣त्सरा꣡सः꣢ । म꣣दच्यु꣡तः꣢ । म꣡द । च्यु꣡तः꣢꣯ ॥८५६॥

Mantra without Swara
अभि सोमास आयवः पवन्ते मद्यं मदम् । समुद्रस्याधि विष्टपे मनीषिणो मत्सरासो मदच्युतः ॥

अभि । सोमासः । आयवः । पवन्ते । मद्यम् । मदम् । समुद्रस्य । सम् । उद्रस्य । अधि । विष्टपे । मनीषिणः । मत्सरासः । मदच्युतः । मद । च्युतः ॥८५६॥

Samveda - Mantra Number : 856
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(आयवः) क्रियाशील, (मनीषिणः) मननशील, (मत्सरासः) उत्साह का सञ्चार करनेवाले, (मदच्युतः) हर्ष की वर्षा करनेवाले (सोमासः) विद्यारस से परिपूर्ण गुरुजन (समुद्रस्य) ज्ञानसागर के (विष्टपे अधि) लोक में अर्थात् गुरुकुल में (मद्यम्) आनन्दजनक (मदम्) तृप्तिप्रद ज्ञानरस को (अभि पवन्ते) शिष्यों के प्रति प्रवाहित करते हैं ॥१॥
Essence
विद्यार्थी जन सुयोग्य गुरुओं के पास से अमृतवर्षी ज्ञानरस को पाकर, स्नातक होकर अन्यों को वह तृप्तिप्रद ज्ञानरस पिलाया करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५१८ पर आनन्दरस का पान किये हुए मनुष्यों के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ ज्ञानी गुरुओं का विषय कहा जाता है।