Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 85

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- द्वितो मृक्तवाहा आत्रेयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्रा꣣त꣢र꣣ग्निः꣡ पु꣢रुप्रि꣣यो꣢ वि꣣श꣡ स्त꣢वे꣣ता꣡ति꣢थिः । वि꣢श्वे꣣ य꣢स्मि꣣न्न꣡म꣢र्त्ये ह꣣व्यं꣡ मर्ता꣢꣯स इ꣣न्ध꣡ते꣢ ॥८५॥

प्रा꣣तः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । पु꣣रुप्रियः꣢ । पु꣣रु । प्रियः꣢ । वि꣣शः꣢ । स्त꣣वेत । अ꣡ति꣢꣯थिः । वि꣡श्वे꣢꣯ । य꣡स्मि꣢꣯न् । अ꣡म꣢꣯र्त्ये । अ । म꣣र्त्ये । ह꣣व्य꣢म् । म꣡र्ता꣢꣯सः । इ꣣न्ध꣡ते꣢ ॥८५॥

Mantra without Swara
प्रातरग्निः पुरुप्रियो विश स्तवेतातिथिः । विश्वे यस्मिन्नमर्त्ये हव्यं मर्तास इन्धते ॥

प्रातः । अग्निः । पुरुप्रियः । पुरु । प्रियः । विशः । स्तवेत । अतिथिः । विश्वे । यस्मिन् । अमर्त्ये । अ । मर्त्ये । हव्यम् । मर्तासः । इन्धते ॥८५॥

Samveda - Mantra Number : 85
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(प्रातः) प्रभातकाल में (पुरुप्रियः) बहुत प्यारा (अतिथिः) अतिथि के समान पूज्य तथा सन्मार्गप्रदर्शक (अग्निः) अग्रणी परमेश्वर (विशः) अध्यात्म-यज्ञ में संलग्न प्रजाओं को (स्तवेत) यथायोग्य साधुवाद दे तथा उपदेश देता रहे, (यस्मिन्) जिस (अमर्त्ये) अमर परमात्माग्नि में (विश्वे) सब (मर्तासः) मरणधर्मा उपासक मनुष्य (हव्यम्) अपनी आत्मारूप हवि को (इन्धते) समर्पित करके प्रदीप्त करते हैं ॥५॥
Essence
जैसे घर में आये विद्वान् अतिथि का जो लोग प्रदान करने योग्य वस्तुओं से सत्कार करते हैं, उन्हें वह वेदादि शास्त्रों का उपदेश करता है, वैसे ही अतिथि के तुल्य परमात्मा को जो लोग श्रद्धा से आत्मसमर्पण करते हैं उन्हें वह साधुवाद और आशीर्वाद देता हुआ सन्मार्ग का उपदेश करता है ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का अतिथि के समान उपकारक होना वर्णित है।