Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 846

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो꣢ अ꣣ग्निं꣢ दे꣣व꣡वी꣣तये ह꣣वि꣡ष्मा꣢ꣳ आ꣣वि꣡वा꣢सति । त꣡स्मै꣢ पावक मृडय ॥८४६॥

यः꣢ । अ꣣ग्नि꣢म् । दे꣣व꣡वी꣢तये । दे꣣व꣢ । वी꣡तये । हवि꣡ष्मा꣢न् । आ꣣वि꣡वा꣢सति । आ꣣ । वि꣡वा꣢꣯सति । त꣡स्मै꣢꣯ । पा꣣वक । मृडय ॥८४६॥

Mantra without Swara
यो अग्निं देववीतये हविष्माꣳ आविवासति । तस्मै पावक मृडय ॥

यः । अग्निम् । देववीतये । देव । वीतये । हविष्मान् । आविवासति । आ । विवासति । तस्मै । पावक । मृडय ॥८४६॥

Samveda - Mantra Number : 846
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। (यः) जो (हविष्मान्) आत्मसमर्पणवाला उपासक (देववीतये) दिव्य गुण-कर्मों की प्राप्ति के लिए (अग्निम्) सब सुख प्राप्त करानेवाले तुझ परमात्मा को (आ विवासति) पूजता है, (तस्मै) उस उपासक को, हे (पावक) पवित्रतादायक परमात्मन् ! आप (मृडय) सुखी कीजिए ॥ द्वितीय—यज्ञ के पक्ष में। (यः) जो (हविष्मान्) उत्तम होम के द्रव्यों से युक्त याज्ञिक मनुष्य (देववीतये) तेज की प्राप्ति के लिए अथवा दिव्य सुख के सम्पादनार्थ (अग्निम्) तुझ यज्ञाग्नि का (आ विवासति) होम से सत्कार करता है (तस्मै) उसे, हे (पावक) वायुशुद्धि तथा हृदयशुद्धि करनेवाले यज्ञाग्नि ! तू (मृडय) आरोग्य आदि प्राप्त कराने के द्वारा सुखी कर, अर्थात् यज्ञाग्नि सुखी करे ॥३॥ यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे श्रद्धा के साथ आत्मसमर्पणपूर्वक उपासना किया गया परमेश्वर दिव्य गुण-कर्मों को प्रेरित करता है, वैसे ही उत्तमोत्तम हव्य-द्रव्यों से होम किया हुआ यज्ञाग्नि आरोग्य प्रदान से तथा हृदय में तेज, शूरता आदि दिव्य गुणों की प्रदीप्ति से सुखी करता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः वही विषय है।