Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 842

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣नानो꣡ वरि꣢꣯वस्कृ꣣ध्यू꣢र्जं꣣ ज꣡ना꣢य गिर्वणः । ह꣡रे꣢ सृजा꣣न꣢ आ꣣शि꣡र꣢म् ॥८४२॥

पु꣣नानः꣢ । व꣡रि꣢꣯वः । कृ꣣धि । ऊ꣡र्ज꣢꣯म् । ज꣡ना꣢꣯य । गि꣣र्वणः । गिः । वनः । ह꣡रे꣢꣯ । सृ꣣जा꣢नः । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् ॥८४२॥

Mantra without Swara
पुनानो वरिवस्कृध्यूर्जं जनाय गिर्वणः । हरे सृजान आशिरम् ॥

पुनानः । वरिवः । कृधि । ऊर्जम् । जनाय । गिर्वणः । गिः । वनः । हरे । सृजानः । आशिरम् । आ । शिरम् ॥८४२॥

Samveda - Mantra Number : 842
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (गिर्वणः) वेदादि वाङ्मय के लिए सेवनीय ! (हरे) दोष, दुर्व्यसन, दुःख आदि को हरनेवाले आचार्य ! (पुनानः) आचरण को पवित्र करते हुए, तथा (आशिरम्) परिपक्व ज्ञान को (सृजानः) उत्पन्न करते हुए आप (जनाय) शिष्यजनों के लिए (वरिवः) धनः और (ऊर्जम्) शारीरिक बल तथा प्राणवत्ता (कृधि) प्रदान कीजिए ॥२॥
Essence
शास्त्र पढ़ाना, चरित्र को पवित्र करना, दोषों को हरना, व्यायाम, प्राणायाम आदि द्वारा बल और प्राण प्रदान करना, अर्थकरी विद्या सिखाना गुरुओं का कर्त्तव्य है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः वही विषय है।