Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 840

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि꣡श्व꣢स्मा꣣ इ꣡त्स्व꣢र्दृ꣣शे꣡ साधा꣢꣯रणꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । गो꣣पा꣢मृ꣣त꣢स्य꣣ वि꣡र्भ꣢रत् ॥८४०॥

वि꣡श्व꣢꣯स्मै । इत् । स्वः꣢ । दृ꣣शे꣢ । सा꣡धा꣢꣯रणम् । र꣣जस्तु꣡र꣢म् । गो꣣पा꣢म् । गो꣣ । पा꣢म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । विः । भ꣣रत् ॥८४०॥

Mantra without Swara
विश्वस्मा इत्स्वर्दृशे साधारणꣳ रजस्तुरम् । गोपामृतस्य विर्भरत् ॥

विश्वस्मै । इत् । स्वः । दृशे । साधारणम् । रजस्तुरम् । गोपाम् । गो । पाम् । ऋतस्य । विः । भरत् ॥८४०॥

Samveda - Mantra Number : 840
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(विश्वस्मै इत्) सभी के लिए (स्वः दृशे) सुखदर्शनार्थ (साधारणम्) जो साधारण है, अर्थात् किये कर्मों के अनुसार जो सभी सत्पात्र जनों को बिना पक्षपात के सुख दर्शाता है, (रजस्तुरम्) जो रजोगुण के द्वारा क्रिया करवाता है, (ऋतस्य) सत्य का (गोपाम्) जो रक्षक है, ऐसे पवमान सोम अर्थात् पवित्र करनेहारे जगत्स्रष्टा परमात्मा को (विः) गतिशील जीवात्मा (भरत्) अपने अन्तःकरण में धारण करे ॥५॥
Essence
परमात्मा सत्य का ही रक्षक है, असत्य का नहीं। उसके न्याय में विश्वास करके सबको सत्कर्म ही करने चाहिएँ ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में भी परमात्मा का ही विषय है।