Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 839

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡धा꣢ हिन्वा꣣न꣡ इ꣢न्द्रि꣣यं꣡ ज्यायो꣢꣯ महि꣣त्व꣡मा꣢नशे । अ꣣भिष्टिकृ꣡द्विच꣢꣯र्षणिः ॥८३९॥

अ꣡ध꣢꣯ । हि꣡न्वानः꣢ । इ꣣न्द्रिय꣢म् । ज्या꣡यः꣢꣯ । म꣣हित्व꣢म् । आ꣣नशे । अभिष्टिकृ꣢त् । अ꣣भिष्टि । कृ꣢त् । वि꣡च꣢꣯र्षणिः । वि । च꣣र्षणिः ॥८३९॥

Mantra without Swara
अधा हिन्वान इन्द्रियं ज्यायो महित्वमानशे । अभिष्टिकृद्विचर्षणिः ॥

अध । हिन्वानः । इन्द्रियम् । ज्यायः । महित्वम् । आनशे । अभिष्टिकृत् । अभिष्टि । कृत् । विचर्षणिः । वि । चर्षणिः ॥८३९॥

Samveda - Mantra Number : 839
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अध) और यह बात भी है कि वह पवमान सोम अर्थात् पवित्रता देनेवाला जगत्स्रष्टा परमात्मा (इन्द्रियम्) आँख आदि इन्द्रिय को अथवा आत्मबल को (हिन्वानः) प्रेरित करता हुआ (ज्यायः) अत्यन्त प्रशस्त (महित्वम्) महत्त्व को (आनशे) प्राप्त करता है। वही (अभिष्टिकृत्) अभीष्ट प्रदाता और (विचर्षणिः) विशेषरूप से सबका साक्षात् द्रष्टा है ॥४॥
Essence
जो मन, आँख, कान आदि में मनन करने, देखने, सुनने आदि के सामर्थ्य को तथा आत्मा में बल को निहित करता है, उस कामना पूर्ण करनेवाले, विश्वद्रष्टा परमात्मा का महत्त्व सबको जानना चाहिए ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का विषय है।